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बस… थोड़ी सी धूप और ... Contest

Posted On: 17 Jan, 2014 Others में

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ग्रहिणी… कृपया कर के इसे इत्यादि ना लें…
बस आज की आदतों पर
पुराने कल की
थोड़ी टाँग खींचने की कोशिश की गयी है…
बस… आप के दिमाग़ का साथ
और हास्य पर आप की दाद चाहूँगा…

*—*—*—*—*—*—*—*—*—*—*—*—*

बस… थोड़ी सी धूप और …

जिंदगी
बड़ी जंग बन रही है
संग हमारे
हमारे कायदों से
‘ये’ बड़ी दंग बन रही है!
फ़्रिज़ और अवन ने
वो क्रांति ला दी है
रसोई-घर के किरदार में
उनके हाथों के स्वाद पर
रोज़ एक नयी जैसे भंग बन रही है…!
कि बचे-खुचे पर
स्वाद का तड़का
और स्वास्थ्य पर
रोज-रोटी-अनुसंधान हल्का-फुल्का
नये वक़्त की
नयी आदत
आज
बड़े सलीके से पल रही है.
कि अक्सर
बच्चों के स्कूल जाने से पहले
उनके टिफिन-बॉक्स में
पराठे भर तो जाते हैं
पर फ़्रिज़ से निकले सामान से भर कर
सिंकने के बाद
कई बार तो खुद उन पराठों को नहीं पता होता
कि वो किस चीज़ के बने होते हैं.
दोस्त पूछ भी लेते हैं स्कूल में कई बार
जवाब भी मिलता है हर बार
आज मेरी माँ ने सुबह उठ कर बनाया था…
पर आख़िर क्या
यही सवाल तो बार- बार
नतीजे पर पहुच नही पाया!
खैर…
कोशिशें तरह-तरह से
हर रसोई-घर में पल रही हैं,
पाक-कला के प्रयोग पर प्रशस्ती
आज बड़ी प्रफुल्लित बन रही है
कि कई बार तो होता है महसूस
आलू के पराठों की विरासत
अँग्रेज़ों के किचन मे कुर्क हो कर
अपनी हस्ती ही धुन रही है.
चूल्हे की कुदरती आँच पर
चोखा-बाटी की सदियों पुरानी वो छौन्क…
जैसे मौसम की पहली बारिश में
नथनों तक पहुचती सोंधी मिट्टी की ओस…
दिन भर खेतों में काम के बाद
शाम की थकान पर
मटके के मीठे पानी की वो तरावट
और कलेजे को सुकून देती हर वो राहत
आज बी पी की बीमारी की बौराहट में
गुन्थ रही है.
ऊँची इमारतों की छाँव में छिपी
सुबह के सूरज की
पहली धूप
आज जैसे जिंदगी से बुझ रही है.
बस अपनी थोड़ी सी ताज़गी के लिए
जिंदगी आज
सच में
बड़ी जंग बन रही है!

*—*—*—*—*—*—*—*—*—*—*—*—*



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

January 22, 2014

yah aaj kee vastvikta hai .bahut sundar

    ikshit के द्वारा
    January 22, 2014

    Shaalini ji… Bilkul hi sahi kaha aapne Yah vastvikta hi hai… Par jiska sach hai, wahi maanne ko taiyaar nahi isiliye ye sach shabd ban kar panno par utar aaya hai… Aur is sach par aap ki shaabashi ke liye aaap ka bahut shukrgujaar hoon.

yamunapathak के द्वारा
January 22, 2014

इक्षित जी बहुत खूब चोखा बाटी की सोंधी सुगंध आज भी कई रसोई की जान है वैसे आपने बहुत सुन्दर व्यंग लिखा है स्टफ पराठे सच में गृहणी के प्रबंधन और मितव्ययी की बानगी हैं …..बेचारा बच्चा क्या करे इसलिए तो टिफ़िन वापस लाता है.

    ikshit के द्वारा
    January 22, 2014

    Yamuna Ji… Aap ke prerak shabdon ne punah kalam ko aur karm karne ke liye samarth kiya hai… Baaki halaat to apne aap hi jeena sikha dete hain… Panno par hi sahi… Aap ki is pratikriya ke liye Aabhari hoon. Bahut-Bahut Dhanyawaad.

Ravindra K Kapoor के द्वारा
January 22, 2014

अच्छी रचना बदलते समाज के साथ बहुत कुछ और भी बदल रहा वो भी तेजी से कि शायद हम अपने पराठों का स्वाद भी कहीं न भूल जाएँ.. सुभकामनाओं के साथ ..रवीन्द्र

    ikshit के द्वारा
    January 22, 2014

    Ravindra K Kapoor ji… aap ki shubh-kaamnaon ka tahe-dil se swaagat hai. Aur rahi baat samaj ki… wo to khud hi hame jeena sikhata hai… Aur usi koshish ko main apne jeevan me paal raha hoon. Asha hai.. aap ki aisi hi shaabashi punah mile gi Bahut-bahut Shukriya…


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